आज काफी थकान के बाद दोस्तो आपसे रूबरू हो रहा हूूं कलम के माध्यम से सारा दिन प्रोग्राम में होने के कारण।पहले शहिदे आजमे भगत सिंह का,फिर मैजिक शौ और फिर सूरतगढ सब्जीमंडी में सफाई अभियान।बहुत अच्छा लगा जब देखा मेरे सूरतगढ की सब्जीमंडी बहुत ही सून्दर लग रही थी उसके बाद बच्चों को निःशुल्क कोचिंग पढाना और अभी अभी एक जन्मदिन में फोटोग्राफी करके लौटा हूं।उसके बाद फोटो बनाना और फिर कहानी संग्रह के लिए कहानियां टाईप करना।आशा करता हूं आप सभी बहन-भाईयों का प्यार और सहयोग इसी प्रकार बना ही रहेगा।पत्रकार रामकरण प्रजापति यथार्थ.27.09.2015
Sunday, 27 September 2015
Friday, 25 September 2015
कहानी -सुकन्या
बेटा देखना बाहर कौन है कोई दरवाजा खटखटा रहा है। मैंने कहा।
अभी तान्या आॅफिस से अन्दर आकर घुसी ही थी,मैंने उसे नई जिम्मेदारी सौंप दी।
अभी आई बाबूजी।तान्या रसोईघर से बोली।
मैं फिर से कहानियां लिखने में व्यस्त हो गया।कहानी के प्रत्येक कथ्य में खोया था कि बेटी तान्या ने आवाज दी।
बाबूजी सुकन्या दीदी है।
कौन सुकन्या दीदी?मैंने प्रश्नसूचक नजरों से पूछा।
बाबूजी वही सुकन्या दीदी हमारी दूसरी...........
ओह मेरी दुसरी बेटी।मैंने फिर से विष्मयाधिवोध से कहा।
बाबूजी वो कह रही हैवो अन्दर नहीं आ सकती है।बेटा अन्दर क्यों नहीं आ सकती हम कोई पराये थोडे ही हैं।बेटी ही तो है हमारी।तुम उसे जबरदस्ती अन्दर ले आओ और चाय की प्याली और नाश्ता लाओ।मैंने कहानी से नजरें चुराते हुए कहा।
मैं बाहर तक खडा होकर जाने की स्थिति में नहीं था।एक तो शरीर वयोवृद्ध हो गया था और नजरें भी कमजोर हो गई,ना जाने कब किससे टकरा जाउं।
नमस्ते बाबूजी।
नमस्ते बेटी।मैं भी उत्तरोतर बोला।
इसी बीच तान्या मेरे लिए और सुकन्या के लिए चाय नाश्ता ले आयी।तान्या का आॅफिस जाने का वक्त हो गया।सो चली गई।
अच्छा तो सुकन्या अब बताओ इतने दिनांे तक कहां थी।क्या हमारे घर की यांदे तुम यहीं छोडकर चली गई?मैंने हंसते हुए और अपना पक्ष मजबूत करते हुए कहा।
जी बाबूजी,यही सत्य मानांे।
मगर सुकन्या के इस उत्तर में एक खामोशी छाई हुई थी,उदासी का भाव साफ नजर आ रहा था।
इससे पहले सुकन्या मुझे बीस वर्ष पहले मिली थी।इतने दिनांे बाद पाकर मैं उतना खुश नहीं हुआ जितना कि आज से दस बारह वर्ष पहले होता।मेरे चेहरे पर उदासियों के भाव ज्यांे के त्यों बने थे।
जाओ सुकन्या एक गिलास रसोई घर से पानी ले आओ।मैं बैठे-बैठे प्यास की स्थिति में आ गया था।मैंने लेखनी को चश्मा पर लगा लिया और कुछ सोचने लगा।काफी देर हो गई थी सुकन्या अब तक आयी क्यों नहीं?मैं अपने ही विचारों में खोया था।
मगर सामने बेठी सुकन्या भी खेदमयी स्थिति में सिर झुकाये मेर बोलने का इन्तजार कर रही थी।मैं ख्यालों से जागा पर सामने पानी नहीं था।सुकन्या सिर झुकाये बेठी थी ऐसा लग रहा था।वैसे भी सुकन्या के लिए हमारा घर अनजान थोडे ही था कि उसे कुछ पता न हो।
ये वही सुकन्या थी जो कभी मेरे इशारे से पहले ही काम कर दिया करती थी। अभिमान का कोई नाम नहीं था।कितनी विनम्र थी।आज ये अभिमान ...।मैं मन ही मन ना जाने क्या क्या सोचे जा रहा था।नहीं सुकन्या नहीं बदल सकती।सुकन्या कैसे बदल सकती है?मन में विचार करते करते कहानी के कथ्यांे पर कडी नजर डाले हुए था।मेरी नजरें पुस्तक तक सिमित हो गई थी।मैं सुकन्या की केवल धुंधली तस्वीर से और मिठी आवाज के सहारे पहचानने में लगा था।
पानी ना मिलने के कारण मेरी प्यास तडप में बदल गई थी और मैं कब औंधे मूंह नीचे गिर गया कुध पता नहीं चला।मेरी सांसे तेजी से चल रही थी,मुंह पर मास्क लगा थाऔर मुझे आॅक्सीजन लगी हुई थी।मेरे पास कौन था मैं पहचानने की कोशिश कर रहा था।बहुत कुछ करने पर भी नजरें उस तक नहीं पहुंच पायीं।मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं घर के किस कोने में हूं।मैंने तडप जारी रखी।किसी ने मेरे पास आने का साहस किया लेकिन उस जबरदस्ती रोक दिया गया।मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कौनसी कहानी का कौनसा पात्र हूं।
मैंने चीख कर आवाज लगाई तान्या बेटा पानी...........
बाबूजी यहां तान्या नहीं है,मैं हूं आपकी बेटी सुकन्या।
कौन सुकन्या ,मैं तो किसी सुकन्या को नहीं जानता हूं तान्या के अलावा।मैंने झुंझलाते हुए कहा।अब मुझे केवल मंद मंद सा संवाद सुनाई दे रहा था।
डाॅक्टर साहब इन्हें बचा लिजिये,शायद इन्होंने याददास्त खो दी है।किसी लडकी की दयामयी आवाज मेरे कानों में पडी।
ये लो मैंने जरूरी दवाईयां लिख दी है।पास ही के हाॅस्पीटल से ले आओ।डाॅक्टर लडकी को समझाते हुए बोल रहे थे।कमरे में अब केवल डाॅक्टर ही थे ,मुझे नींद आ गई।मैं उठा तेा ग्लूकोज और खून चढाया जा रहा था।मुंह पर मास्क लगा था।
अब मुझे सांस लेने में कोई दिक्कत नही हो रही थी।नजरें भी दूर तक जा रही थी। मैं शहर के किसी हाॅस्पीटल में था,कमरे में डाॅक्टर मेरे ईलाज में व्यस्त थे और बाहर से किसी के सुबकने की आवाज आ रही थी।
मैंने देखा वह लडकी कांच के जडे दरवाजे से बाहर बैठी रो रही थी।
डाॅक्टर वो लडकी कौन है?मैंने इशारे से पूछाा।
जी,अपने आप को सुकन्या नाम लेकर आप ही की बेटी बता रही है।
क्या आपके एक ही विकलांग लडकी है लडका नहीं है।डाॅक्टर ने मुझसे संशय की नजरों से देखते हुए पूछा।
मैं डाॅक्टर की बातों को समझ नहीं सका।
अब मैं चलने में भी समर्थ हो गया था और दिखाई भी साफ देने लगा था।
सुकन्या तुम और विकलांग!सहसा मैंने सुकन्या के कंधे पर हाथ रखते हुए प्रश्नात्मक दृष्टि से कहा जैसे मुझे पहले मालूम ही ना हो।
बाबूजी आप यहां,आप आराम करो अभी।उसने अबोधपूर्वक कहा।
हाॅं बेटी अब मैं पूर्णतया ठीक हूं।अब मुझे दिखाई भी दे रहा है।मैने खुशी का अहसास कराते हुए कहा।पर तुम!विकलांग कैसे हो गई और चल भी नहीं सकती।मैंने उसके अबोध मन पर यकायक प्रश्नों की पिटारी खोल दी।
मैं एक तरफ खडा अपने आप को अपराधबोध समझने लगा।काश!मुझे पता होता सुकन्या विकलांग है तो मै। पानी स्वयं लाकर पी लेता,चाहे किसी से टकराता लेकिन अबोध को टिस तो नहीं पहुंचती।
घर चलते हैं बाबूजी तान्या हमारा इन्तजार कर रही होगी।दोनोे ने आॅटो किराये पर कर लिया।रास्ते में दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई।
घर आये तो तान्या हमारा ही इन्तजार कर रही थी।शायद आज आॅफिस से जल्दी आ गई थी।घर पहुंचते ही तान्या ने उन्हें डांटना शुरू कर दिया।कहां गये थे बाबूजी,आपको कितनी बार समझाया है,कोई काम हो तो मुझे बता दिया करो,मैं कर दिया करूंगी।
क्यों डांट रही हो बहन इसमें बाबूजी की गलती थोडे ही है ये तो उम्र का पडाव है,जरा सा शरीर में दर्द हुआ था सो अस्पताल ले गई।
मुझे फोन कर देती क्यों इतना कष्ठ उठाया बहन।
कैसे करती ,ये सब अचानक हो गया और फिर मेरे पास आपके नम्बर भी तो नहीं थे।बडी मुश्किल द्वारा आटो किया और हाॅस्पिटल ले गई ।फोन करने का वक्त ही कहां था,ये तो बेहोश हो गये थे।
तान्या ,सुकन्या को रसोईघर में ले गई।मैं सुकन्या के बारे में सोचता रहा।
रवि और सुकन्या बहुत चाहते थे एक दूसरे को ।मैंने सुकन्या को पहली बार काॅलेज में पढाते वक्त देखा था।बडे ही चुलबुलेपन से अपनी सखियों से कह रही थी -‘जानते हो मेरे गुरूजी कहानीकार हैं,बहुत बडी बडी कहानियां लिखते हैं,बाप रे।’जैसे कोई टीवी सिरियल ही बना देते हों।
रवि मुर्गा बन जाओ।कक्षा में जरा भी पढने में ध्यान नहीं देते सारा दिन बस बातें ही बातें ।
तभी मुझे किसी अध्यापक ने जरूरी काम से बाहर बुला लिया।करीब घंटे भर बाद लौटा तो देखा सारे बच्चे रवि के आस पास बैठे घुसर-पुसर कर रहे थे।मैंने सभी को अपनी -अपनी बेंचों पर बैठने को कहा।सुकन्या अब भी रवि के पास बैठी आंसू बहा रही थी।
उठो बेटी रवि तो नादान है तुम तो समझदार हो।कक्षा में बातें मत किया करो।यह तुम्हारे जीवन का पहला पडाव है।अभी तुम्हें बहुत आगे जाना है,अपने मम्मी-पापा का नाम रोशन करना है।समय तुम्हारे लिये बहुत महत्ता रखता है।अभी से इसका सदुपयोग करो।
तभी घंटी बजी और सभी मंच के पास जा बैठे आज वार्षिक काव्य सम्मेलन होना था।मैंने भी इस प्रतियोगिता में निर्णायक भूमिका अदा करनी थी।मैं सुकन्या को प्रथम पुरस्कार के लिए कैसे नामांकित कर सकता था।हालांकि उसी के काव्य पर तालियां की गडगडाहठ आयी थी।मैं जानना चाहता था सुकन्या का मन कैसा है?
सचमुच कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।ना ही कोई शंका और ना ही कोई गलानी।सहेलियों से बस इतना ही कहते हुए मैंने सुना मेरा प्रयास अच्छा नहीं था। आज रवि होता तो प्रथम मैं ही आती।और मैं संकुचाते हुए उनकी टोली के पास से गुजर गया।काॅलेज से सीधा हाॅस्पिटल गया जहां रवि भर्ती करवाया हुआ था।डाॅक्टर ने बताया रवि की टांगे काफी कमजोर हो गई हैं।अब वह की भी उठकर चल नहीं सकेगा।इसी कारण से रवि की काॅलेज से भी छुटटी हेा गई।
रवि के कारण मेरा भी काॅलेज छूट गया।रवि को बडे बडे हाॅस्पीटलांे में ले जाया गया।मगर रवि बच नहीं पाया।अब हम केवल दो ही जने बचे थे ,तान्या अभी बच्ची ही थी।पास की के स्कूल में भर्ती करवा दिया।और अपने दैनिक जीवन में लग गया कहानी लिखने को।हर बार मन में एक ही कसक रहती इस कहानी का पात्र कौन है।बडे बडे पुरस्कार मिले पर संतोष नहीं।
इसी बीच सुकन्या के पत्र भी आते थे ।बाबूजी रवि कैसा है?क्या वह पूर्णतया ठीक हो गया?हर बार उसके ढेरांे सवाल होते।मगर मै। उत्तर क्या देता ,यही कि तुम्हारे प्यार का दुश्मन मैं ही हूं।मेरा भी तो शिष्य के प्रति फर्ज बनता था,वही तो मैंने किया।
मैं जिस काॅलेज में प्राध्यापक था उसी काॅलेज में सुकन्या प्राध्यापिका बन गयी।तान्या को भी उसी काॅलेज से गुजरना था।लेकिन अब उसे गुरू शिष्य का नहीं मित्रता का रिस्ता मिला।
मैं हर रोज कहता तान्या तुम सुकन्या को कब से जानती हो।और वह कहती जन्म से बाबूजी।
मैं जानता था सुकन्या से उसकी विकलांगता के बारे में कोई उत्तर नहीं मिलेगा।उसकी नजर घर में रवि को देखने में लगी थी।
जल्द ही खुशी का माहौल बन गया।जैसे आज फिर मंच पर आने वाली हो।
धीरे से तान्या ने मेरे हाथ में एक पुस्तक थमा दी लिखा था-दी ग्रेट स्टाॅरी राईटर माई फादर. लेखिका सुकन्या।उसमें वो ही कहानियां थी जो कभी मैंने लिखी थी जब पढी तो पता चला।लेकिन ये काफी सुन्दर ढंग से प्रकाशित हुई थी अब।
उउउउउउउउउ.... ये लो अब अपना पुरस्कार।
तान्या अनमना ढंग बनाते हुए बोली।
मैं खुशी से चीखा।ये तो नोबेल पुरस्कार है।बेटी तुम्हें मिला है।मन ही मन खुशी के भाव थे।
जी नहीं बाबूजी,आपको।सुकन्या बीच में ही बोल उठी।रवि होता तो ये पुरस्कार मेरा ही था।अब तो ये आपका ही है।
मेैंने पुस्तक को ध्यान से पढा अन्तिम पक्तिंयों में लिखा था आने वाले समय में दहेज मिलेगा लेकिन दुल्हे को नहीं ,दुल्हन को और वो भी दुल्हे के रूप में।
एक तरफ मेरे पास कहानियों के सैंकडों ग्रंथ पडे थे तो एक तरफ ये पुस्तक।मैं इस पुस्तक में दम महसूस कर रहा था।मैंने बडे ही प्यार से सुकन्या का माथा चूम लिया।
ठीक है बाबूजी अब मैं अपने घर जाती हूं।लडकी का घर उसके पत्तिदेव का घर ही होता है।तान्या ने रोकना चाहा पर वह रूकी नहीं।और मेरे मन में एक प्रश्न छोड गई नारी की इस विकलांगता का कारण क्या है।क्या पुरूष वर्ग की दबंगता या नारी का ममत्व।मैं सुकन्या को जाते हुए देखता ही रहा।इन्तजार करता रहा उसके लौटकर आने का।मगर वो कभी नहीं आयी।
काश!मैं रवि और सुकन्या की मित्रता समझ पाता कि नारी को भी हक है अपने अधिकारों में स्वायत्तता रखने का।मगर समझता भी कैसे मैं तो पुरूष हूं ना ।एक बार फिर मेरी नजर मैंने पुरस्कार और पुस्तक पर डाली वो सुकन्या के प्यार से कहीं छोटे नजर आये।
तान्या की आवाज आयी,बाबूजी सो जाओ सुबह मुझे मेरे लिये लडका देखने जाना है।
सहसा मैं कुर्सी से उठा और बेटी के सपनों के राजकुमार से मिलने के खातिर बिस्तर पर सोने को चल दिया।सामने रवि का फोटो था तो मन में सुकन्या का साहस।
.......पत्रकार रामकरण प्रजापति यथार्थ
बेटा देखना बाहर कौन है कोई दरवाजा खटखटा रहा है। मैंने कहा।
अभी तान्या आॅफिस से अन्दर आकर घुसी ही थी,मैंने उसे नई जिम्मेदारी सौंप दी।
अभी आई बाबूजी।तान्या रसोईघर से बोली।
मैं फिर से कहानियां लिखने में व्यस्त हो गया।कहानी के प्रत्येक कथ्य में खोया था कि बेटी तान्या ने आवाज दी।
बाबूजी सुकन्या दीदी है।
कौन सुकन्या दीदी?मैंने प्रश्नसूचक नजरों से पूछा।
बाबूजी वही सुकन्या दीदी हमारी दूसरी...........
ओह मेरी दुसरी बेटी।मैंने फिर से विष्मयाधिवोध से कहा।
बाबूजी वो कह रही हैवो अन्दर नहीं आ सकती है।बेटा अन्दर क्यों नहीं आ सकती हम कोई पराये थोडे ही हैं।बेटी ही तो है हमारी।तुम उसे जबरदस्ती अन्दर ले आओ और चाय की प्याली और नाश्ता लाओ।मैंने कहानी से नजरें चुराते हुए कहा।
मैं बाहर तक खडा होकर जाने की स्थिति में नहीं था।एक तो शरीर वयोवृद्ध हो गया था और नजरें भी कमजोर हो गई,ना जाने कब किससे टकरा जाउं।
नमस्ते बाबूजी।
नमस्ते बेटी।मैं भी उत्तरोतर बोला।
इसी बीच तान्या मेरे लिए और सुकन्या के लिए चाय नाश्ता ले आयी।तान्या का आॅफिस जाने का वक्त हो गया।सो चली गई।
अच्छा तो सुकन्या अब बताओ इतने दिनांे तक कहां थी।क्या हमारे घर की यांदे तुम यहीं छोडकर चली गई?मैंने हंसते हुए और अपना पक्ष मजबूत करते हुए कहा।
जी बाबूजी,यही सत्य मानांे।
मगर सुकन्या के इस उत्तर में एक खामोशी छाई हुई थी,उदासी का भाव साफ नजर आ रहा था।
इससे पहले सुकन्या मुझे बीस वर्ष पहले मिली थी।इतने दिनांे बाद पाकर मैं उतना खुश नहीं हुआ जितना कि आज से दस बारह वर्ष पहले होता।मेरे चेहरे पर उदासियों के भाव ज्यांे के त्यों बने थे।
जाओ सुकन्या एक गिलास रसोई घर से पानी ले आओ।मैं बैठे-बैठे प्यास की स्थिति में आ गया था।मैंने लेखनी को चश्मा पर लगा लिया और कुछ सोचने लगा।काफी देर हो गई थी सुकन्या अब तक आयी क्यों नहीं?मैं अपने ही विचारों में खोया था।
मगर सामने बेठी सुकन्या भी खेदमयी स्थिति में सिर झुकाये मेर बोलने का इन्तजार कर रही थी।मैं ख्यालों से जागा पर सामने पानी नहीं था।सुकन्या सिर झुकाये बेठी थी ऐसा लग रहा था।वैसे भी सुकन्या के लिए हमारा घर अनजान थोडे ही था कि उसे कुछ पता न हो।
ये वही सुकन्या थी जो कभी मेरे इशारे से पहले ही काम कर दिया करती थी। अभिमान का कोई नाम नहीं था।कितनी विनम्र थी।आज ये अभिमान ...।मैं मन ही मन ना जाने क्या क्या सोचे जा रहा था।नहीं सुकन्या नहीं बदल सकती।सुकन्या कैसे बदल सकती है?मन में विचार करते करते कहानी के कथ्यांे पर कडी नजर डाले हुए था।मेरी नजरें पुस्तक तक सिमित हो गई थी।मैं सुकन्या की केवल धुंधली तस्वीर से और मिठी आवाज के सहारे पहचानने में लगा था।
पानी ना मिलने के कारण मेरी प्यास तडप में बदल गई थी और मैं कब औंधे मूंह नीचे गिर गया कुध पता नहीं चला।मेरी सांसे तेजी से चल रही थी,मुंह पर मास्क लगा थाऔर मुझे आॅक्सीजन लगी हुई थी।मेरे पास कौन था मैं पहचानने की कोशिश कर रहा था।बहुत कुछ करने पर भी नजरें उस तक नहीं पहुंच पायीं।मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं घर के किस कोने में हूं।मैंने तडप जारी रखी।किसी ने मेरे पास आने का साहस किया लेकिन उस जबरदस्ती रोक दिया गया।मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कौनसी कहानी का कौनसा पात्र हूं।
मैंने चीख कर आवाज लगाई तान्या बेटा पानी...........
बाबूजी यहां तान्या नहीं है,मैं हूं आपकी बेटी सुकन्या।
कौन सुकन्या ,मैं तो किसी सुकन्या को नहीं जानता हूं तान्या के अलावा।मैंने झुंझलाते हुए कहा।अब मुझे केवल मंद मंद सा संवाद सुनाई दे रहा था।
डाॅक्टर साहब इन्हें बचा लिजिये,शायद इन्होंने याददास्त खो दी है।किसी लडकी की दयामयी आवाज मेरे कानों में पडी।
ये लो मैंने जरूरी दवाईयां लिख दी है।पास ही के हाॅस्पीटल से ले आओ।डाॅक्टर लडकी को समझाते हुए बोल रहे थे।कमरे में अब केवल डाॅक्टर ही थे ,मुझे नींद आ गई।मैं उठा तेा ग्लूकोज और खून चढाया जा रहा था।मुंह पर मास्क लगा था।
अब मुझे सांस लेने में कोई दिक्कत नही हो रही थी।नजरें भी दूर तक जा रही थी। मैं शहर के किसी हाॅस्पीटल में था,कमरे में डाॅक्टर मेरे ईलाज में व्यस्त थे और बाहर से किसी के सुबकने की आवाज आ रही थी।
मैंने देखा वह लडकी कांच के जडे दरवाजे से बाहर बैठी रो रही थी।
डाॅक्टर वो लडकी कौन है?मैंने इशारे से पूछाा।
जी,अपने आप को सुकन्या नाम लेकर आप ही की बेटी बता रही है।
क्या आपके एक ही विकलांग लडकी है लडका नहीं है।डाॅक्टर ने मुझसे संशय की नजरों से देखते हुए पूछा।
मैं डाॅक्टर की बातों को समझ नहीं सका।
अब मैं चलने में भी समर्थ हो गया था और दिखाई भी साफ देने लगा था।
सुकन्या तुम और विकलांग!सहसा मैंने सुकन्या के कंधे पर हाथ रखते हुए प्रश्नात्मक दृष्टि से कहा जैसे मुझे पहले मालूम ही ना हो।
बाबूजी आप यहां,आप आराम करो अभी।उसने अबोधपूर्वक कहा।
हाॅं बेटी अब मैं पूर्णतया ठीक हूं।अब मुझे दिखाई भी दे रहा है।मैने खुशी का अहसास कराते हुए कहा।पर तुम!विकलांग कैसे हो गई और चल भी नहीं सकती।मैंने उसके अबोध मन पर यकायक प्रश्नों की पिटारी खोल दी।
मैं एक तरफ खडा अपने आप को अपराधबोध समझने लगा।काश!मुझे पता होता सुकन्या विकलांग है तो मै। पानी स्वयं लाकर पी लेता,चाहे किसी से टकराता लेकिन अबोध को टिस तो नहीं पहुंचती।
घर चलते हैं बाबूजी तान्या हमारा इन्तजार कर रही होगी।दोनोे ने आॅटो किराये पर कर लिया।रास्ते में दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई।
घर आये तो तान्या हमारा ही इन्तजार कर रही थी।शायद आज आॅफिस से जल्दी आ गई थी।घर पहुंचते ही तान्या ने उन्हें डांटना शुरू कर दिया।कहां गये थे बाबूजी,आपको कितनी बार समझाया है,कोई काम हो तो मुझे बता दिया करो,मैं कर दिया करूंगी।
क्यों डांट रही हो बहन इसमें बाबूजी की गलती थोडे ही है ये तो उम्र का पडाव है,जरा सा शरीर में दर्द हुआ था सो अस्पताल ले गई।
मुझे फोन कर देती क्यों इतना कष्ठ उठाया बहन।
कैसे करती ,ये सब अचानक हो गया और फिर मेरे पास आपके नम्बर भी तो नहीं थे।बडी मुश्किल द्वारा आटो किया और हाॅस्पिटल ले गई ।फोन करने का वक्त ही कहां था,ये तो बेहोश हो गये थे।
तान्या ,सुकन्या को रसोईघर में ले गई।मैं सुकन्या के बारे में सोचता रहा।
रवि और सुकन्या बहुत चाहते थे एक दूसरे को ।मैंने सुकन्या को पहली बार काॅलेज में पढाते वक्त देखा था।बडे ही चुलबुलेपन से अपनी सखियों से कह रही थी -‘जानते हो मेरे गुरूजी कहानीकार हैं,बहुत बडी बडी कहानियां लिखते हैं,बाप रे।’जैसे कोई टीवी सिरियल ही बना देते हों।
रवि मुर्गा बन जाओ।कक्षा में जरा भी पढने में ध्यान नहीं देते सारा दिन बस बातें ही बातें ।
तभी मुझे किसी अध्यापक ने जरूरी काम से बाहर बुला लिया।करीब घंटे भर बाद लौटा तो देखा सारे बच्चे रवि के आस पास बैठे घुसर-पुसर कर रहे थे।मैंने सभी को अपनी -अपनी बेंचों पर बैठने को कहा।सुकन्या अब भी रवि के पास बैठी आंसू बहा रही थी।
उठो बेटी रवि तो नादान है तुम तो समझदार हो।कक्षा में बातें मत किया करो।यह तुम्हारे जीवन का पहला पडाव है।अभी तुम्हें बहुत आगे जाना है,अपने मम्मी-पापा का नाम रोशन करना है।समय तुम्हारे लिये बहुत महत्ता रखता है।अभी से इसका सदुपयोग करो।
तभी घंटी बजी और सभी मंच के पास जा बैठे आज वार्षिक काव्य सम्मेलन होना था।मैंने भी इस प्रतियोगिता में निर्णायक भूमिका अदा करनी थी।मैं सुकन्या को प्रथम पुरस्कार के लिए कैसे नामांकित कर सकता था।हालांकि उसी के काव्य पर तालियां की गडगडाहठ आयी थी।मैं जानना चाहता था सुकन्या का मन कैसा है?
सचमुच कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।ना ही कोई शंका और ना ही कोई गलानी।सहेलियों से बस इतना ही कहते हुए मैंने सुना मेरा प्रयास अच्छा नहीं था। आज रवि होता तो प्रथम मैं ही आती।और मैं संकुचाते हुए उनकी टोली के पास से गुजर गया।काॅलेज से सीधा हाॅस्पिटल गया जहां रवि भर्ती करवाया हुआ था।डाॅक्टर ने बताया रवि की टांगे काफी कमजोर हो गई हैं।अब वह की भी उठकर चल नहीं सकेगा।इसी कारण से रवि की काॅलेज से भी छुटटी हेा गई।
रवि के कारण मेरा भी काॅलेज छूट गया।रवि को बडे बडे हाॅस्पीटलांे में ले जाया गया।मगर रवि बच नहीं पाया।अब हम केवल दो ही जने बचे थे ,तान्या अभी बच्ची ही थी।पास की के स्कूल में भर्ती करवा दिया।और अपने दैनिक जीवन में लग गया कहानी लिखने को।हर बार मन में एक ही कसक रहती इस कहानी का पात्र कौन है।बडे बडे पुरस्कार मिले पर संतोष नहीं।
इसी बीच सुकन्या के पत्र भी आते थे ।बाबूजी रवि कैसा है?क्या वह पूर्णतया ठीक हो गया?हर बार उसके ढेरांे सवाल होते।मगर मै। उत्तर क्या देता ,यही कि तुम्हारे प्यार का दुश्मन मैं ही हूं।मेरा भी तो शिष्य के प्रति फर्ज बनता था,वही तो मैंने किया।
मैं जिस काॅलेज में प्राध्यापक था उसी काॅलेज में सुकन्या प्राध्यापिका बन गयी।तान्या को भी उसी काॅलेज से गुजरना था।लेकिन अब उसे गुरू शिष्य का नहीं मित्रता का रिस्ता मिला।
मैं हर रोज कहता तान्या तुम सुकन्या को कब से जानती हो।और वह कहती जन्म से बाबूजी।
मैं जानता था सुकन्या से उसकी विकलांगता के बारे में कोई उत्तर नहीं मिलेगा।उसकी नजर घर में रवि को देखने में लगी थी।
जल्द ही खुशी का माहौल बन गया।जैसे आज फिर मंच पर आने वाली हो।
धीरे से तान्या ने मेरे हाथ में एक पुस्तक थमा दी लिखा था-दी ग्रेट स्टाॅरी राईटर माई फादर. लेखिका सुकन्या।उसमें वो ही कहानियां थी जो कभी मैंने लिखी थी जब पढी तो पता चला।लेकिन ये काफी सुन्दर ढंग से प्रकाशित हुई थी अब।
उउउउउउउउउ.... ये लो अब अपना पुरस्कार।
तान्या अनमना ढंग बनाते हुए बोली।
मैं खुशी से चीखा।ये तो नोबेल पुरस्कार है।बेटी तुम्हें मिला है।मन ही मन खुशी के भाव थे।
जी नहीं बाबूजी,आपको।सुकन्या बीच में ही बोल उठी।रवि होता तो ये पुरस्कार मेरा ही था।अब तो ये आपका ही है।
मेैंने पुस्तक को ध्यान से पढा अन्तिम पक्तिंयों में लिखा था आने वाले समय में दहेज मिलेगा लेकिन दुल्हे को नहीं ,दुल्हन को और वो भी दुल्हे के रूप में।
एक तरफ मेरे पास कहानियों के सैंकडों ग्रंथ पडे थे तो एक तरफ ये पुस्तक।मैं इस पुस्तक में दम महसूस कर रहा था।मैंने बडे ही प्यार से सुकन्या का माथा चूम लिया।
ठीक है बाबूजी अब मैं अपने घर जाती हूं।लडकी का घर उसके पत्तिदेव का घर ही होता है।तान्या ने रोकना चाहा पर वह रूकी नहीं।और मेरे मन में एक प्रश्न छोड गई नारी की इस विकलांगता का कारण क्या है।क्या पुरूष वर्ग की दबंगता या नारी का ममत्व।मैं सुकन्या को जाते हुए देखता ही रहा।इन्तजार करता रहा उसके लौटकर आने का।मगर वो कभी नहीं आयी।
काश!मैं रवि और सुकन्या की मित्रता समझ पाता कि नारी को भी हक है अपने अधिकारों में स्वायत्तता रखने का।मगर समझता भी कैसे मैं तो पुरूष हूं ना ।एक बार फिर मेरी नजर मैंने पुरस्कार और पुस्तक पर डाली वो सुकन्या के प्यार से कहीं छोटे नजर आये।
तान्या की आवाज आयी,बाबूजी सो जाओ सुबह मुझे मेरे लिये लडका देखने जाना है।
सहसा मैं कुर्सी से उठा और बेटी के सपनों के राजकुमार से मिलने के खातिर बिस्तर पर सोने को चल दिया।सामने रवि का फोटो था तो मन में सुकन्या का साहस।
.......पत्रकार रामकरण प्रजापति यथार्थ
Saturday, 19 September 2015
गणपति महोत्सव में दिखा राजतिलक का जादू
श्योुराकस्सी,राजस्थान के महान जादूगर और आर्टिस्ट राजतिलक प्रजापति ने उदयपुर के गांव चांदेसरा में ग्रामवासियों को बेटी बचाओ बेटी पढाओ अैार नशा मुक्ति का संदेश देते हुए कहा आज के समय में बेटियां अनमोल है।इस अनमोलता को समाज बनाये रखे।उन्होंने कहा धर्म स्थान भी समाज में असहाय बेटियांे को आगे बढाए और युवाओं को नशा ना करने औरदेशहित सामाजिक नजरिया अपनाने का आहवान किया।उन्होंने बताया वे बच्चों केा आगे बढाने हेतु एक सामाजिक संगठन का निर्माण कर हैं जिसके तहत स्कूलों सामाजिक संगठनों राजनितिक दलों पत्रकारों को साथ जोडेंगे।चारभुजानाथ मंदिर में आयोजित इस शौ में उन्होंने गुब्बारे को ब्लास्ट कर खाली हाथ से फलोवर बनाना,अलग अलग कडी को जोडकर हम सब एक हैं का संदेश देना,गीले पेपर को सुखाना,कागज जला कर रूपये बनाना,ताश का मैल बनाना,गर्दन के आरपार तलवार निकालना,फलाॅवर के कलर चैंज करना,कच्चे चावल को पका देना,ताश के पत्तों का कलर चेंज करना और खाली बाॅक्स से बार बार फलोवर बनाना आदि बच्चेां ने खूब सराहे।उनके साथ आये मिमिक्री कलाकारों ने खूब हंसाया।जादूगर राजतिलक ने पत्रकार रामकरण प्रजापति के बेटी बचाओ बेटी पढाओ अभियान की खूब प्रशंसा करते हुए कहा जनता अब इस अभियान से अधिक से अधिक जूड रही है।हमें कदम मिलाकर बेटी को आगे बढाना होगा।
बरसात के बावजूद भी बच्चों और वृ़़द्धजनों का उत्साह बना ही रहा।चार दिनांे से शारीरिक परेशानी से सामना झेल रहे जादूगर को काफी उत्साह मिला और उन्होंने सामाजिक संगठनों का आभार जतायां
श्योुराकस्सी,राजस्थान के महान जादूगर और आर्टिस्ट राजतिलक प्रजापति ने उदयपुर के गांव चांदेसरा में ग्रामवासियों को बेटी बचाओ बेटी पढाओ अैार नशा मुक्ति का संदेश देते हुए कहा आज के समय में बेटियां अनमोल है।इस अनमोलता को समाज बनाये रखे।उन्होंने कहा धर्म स्थान भी समाज में असहाय बेटियांे को आगे बढाए और युवाओं को नशा ना करने औरदेशहित सामाजिक नजरिया अपनाने का आहवान किया।उन्होंने बताया वे बच्चों केा आगे बढाने हेतु एक सामाजिक संगठन का निर्माण कर हैं जिसके तहत स्कूलों सामाजिक संगठनों राजनितिक दलों पत्रकारों को साथ जोडेंगे।चारभुजानाथ मंदिर में आयोजित इस शौ में उन्होंने गुब्बारे को ब्लास्ट कर खाली हाथ से फलोवर बनाना,अलग अलग कडी को जोडकर हम सब एक हैं का संदेश देना,गीले पेपर को सुखाना,कागज जला कर रूपये बनाना,ताश का मैल बनाना,गर्दन के आरपार तलवार निकालना,फलाॅवर के कलर चैंज करना,कच्चे चावल को पका देना,ताश के पत्तों का कलर चेंज करना और खाली बाॅक्स से बार बार फलोवर बनाना आदि बच्चेां ने खूब सराहे।उनके साथ आये मिमिक्री कलाकारों ने खूब हंसाया।जादूगर राजतिलक ने पत्रकार रामकरण प्रजापति के बेटी बचाओ बेटी पढाओ अभियान की खूब प्रशंसा करते हुए कहा जनता अब इस अभियान से अधिक से अधिक जूड रही है।हमें कदम मिलाकर बेटी को आगे बढाना होगा।
बरसात के बावजूद भी बच्चों और वृ़़द्धजनों का उत्साह बना ही रहा।चार दिनांे से शारीरिक परेशानी से सामना झेल रहे जादूगर को काफी उत्साह मिला और उन्होंने सामाजिक संगठनों का आभार जतायां
गजल
तुम्हारे चरणों की धूल तो मिले।
विरान बगिया में फूल तो खिले।।
यथार्थ अरमान बुनों दिल में।
अंधियारों में एक दीप तो जले।।
कहां अभिमान था तन पर।
देह उठी एक लौ तो जले।।
चले गये जिन्हें जल्दी थी यारो।
आलम ये वक्त का फिर से तो मिले।।
कौन लिखता है तकदीर की रेखाएं।
जिनके हाथ नहीं उनके बच्चे भी तो पलें।।
अश्क भी सूख जाते हैं हमसाया बनकर।
तुम्हारे चरणों की धूल तो मिले।
विरान बगिया में फूल तो खिले।।
यथार्थ अरमान बुनों दिल में।
अंधियारों में एक दीप तो जले।।
कहां अभिमान था तन पर।
देह उठी एक लौ तो जले।।
चले गये जिन्हें जल्दी थी यारो।
आलम ये वक्त का फिर से तो मिले।।
कौन लिखता है तकदीर की रेखाएं।
जिनके हाथ नहीं उनके बच्चे भी तो पलें।।
अश्क भी सूख जाते हैं हमसाया बनकर।
मगर हर किसी की आंखेंा में प्रीत तो चले।।
वो जिन्दा है यारो दिलों में हर किसी के।
जिनके कदम एक वतन की लीक तो चले।।
........पत्रकार/साहित्कार रामकरण प्रजापति यथार्थ.21.08.2007
Friday, 18 September 2015
मेरे जीवन की यादें.................................
रामकरण प्रजापति यथार्थ
किसी अजनबी ने दिया सौ रूपये पुरस्कार
25जून 2007 की तेज धूप की बात है।मैं सूरतगढ से सायकिल द्वारा गांव की और आ रहा था।भगवानसर स्टेशन के पास एक कार वाला विकास कुमार जिसकी कार का एक टायर पंचर हो रखा था।मगर वह खुल नहीं रहा था।तेज आंधी और लू के बीच दो घंटे तक मशक्त के बाद मैंने बडी मुश्किल से टायर खेाला।उसकी भी सांस में सांस आयी।विकास कुमार ने जाते समय मुझे सौ का नेाट थमाना चाहा।मेरा हरदय रूपये लेने को आतुर नहीं था।मैंने उन सज्जन केा बताया मैं अपनी धर्म बहन 28पीबीएन जा रहा हूं और उनसे राखी बंधवानी है।तब उन्होंने मुझे अपने साथ लाये लडडू,पकौडी,बर्फी व भूजिया दिये जो मेरे लिए सौ रूपये से कहीं बढकर थे।उन्होंने बताया आज ही उनकी मां का श्रीगंगानगर में आॅप्रेशन सफल हुआ है।फिर मैंने उन्हंे अपना पूरा पता और परिचय दिया।उन्होंने भी मुझे अपनी फोटो दी।उनकी राजा सिनेमा रोड फाजिल्का में गारमेंटस को शोरूम है।आगे बढा तेा भंयकर बारिस शुरू हो गई।मैं रातभर अपनी बहन के पास ही रहा।उन सज्जन और अजनबी का प्यार सौ रूपये से कहीं बढकर था।मुझे आज भी अपनी पत्रकारिता मिशन पर गर्व है।
रामकरण प्रजापति यथार्थ
किसी अजनबी ने दिया सौ रूपये पुरस्कार
25जून 2007 की तेज धूप की बात है।मैं सूरतगढ से सायकिल द्वारा गांव की और आ रहा था।भगवानसर स्टेशन के पास एक कार वाला विकास कुमार जिसकी कार का एक टायर पंचर हो रखा था।मगर वह खुल नहीं रहा था।तेज आंधी और लू के बीच दो घंटे तक मशक्त के बाद मैंने बडी मुश्किल से टायर खेाला।उसकी भी सांस में सांस आयी।विकास कुमार ने जाते समय मुझे सौ का नेाट थमाना चाहा।मेरा हरदय रूपये लेने को आतुर नहीं था।मैंने उन सज्जन केा बताया मैं अपनी धर्म बहन 28पीबीएन जा रहा हूं और उनसे राखी बंधवानी है।तब उन्होंने मुझे अपने साथ लाये लडडू,पकौडी,बर्फी व भूजिया दिये जो मेरे लिए सौ रूपये से कहीं बढकर थे।उन्होंने बताया आज ही उनकी मां का श्रीगंगानगर में आॅप्रेशन सफल हुआ है।फिर मैंने उन्हंे अपना पूरा पता और परिचय दिया।उन्होंने भी मुझे अपनी फोटो दी।उनकी राजा सिनेमा रोड फाजिल्का में गारमेंटस को शोरूम है।आगे बढा तेा भंयकर बारिस शुरू हो गई।मैं रातभर अपनी बहन के पास ही रहा।उन सज्जन और अजनबी का प्यार सौ रूपये से कहीं बढकर था।मुझे आज भी अपनी पत्रकारिता मिशन पर गर्व है।
मेरे जीवन की यादें.....
पत्रकार रामकरण प्रजापति यथार्थ
से बात है 23अक्टूबर 2006की मैंने मेरे आस पास के गांवों में अपनी और से ग्रामीण विकास के लिए स्कूल से हटकर स्कूल योजना चला रखी थी।इस योजना के अन्तर्गत मैंने कक्षा आठवीं और दसवीं के राजकीय विद्यालयों के बच्चों को मैं स्कूल समय के बाद पढाता था।इसमें मैंने ग्राम श्योपुराश्1,2केएसआर पालीवाला,28पीबीएन व भगवानसर शामिल किये।मेरा एक महिने का समय था।इस एक महिने में मैं हिन्दी दिवस,गांधी.शास्त्री जयन्ती,बेटी बचाओ अभियान आदि केा खूब तव्वजो दी।बच्चों से चित्रकला,लेख,भाषण,आदि प्रतियोगितायें करवायी।अब समस्या ये थी कि इनके पुरस्कारों की व्यवस्था केसे की जाए।मैंने अपना जादूई दिमाग लगाया।और हमारे गांव में राजेशकुमार वर्मा ने दुकान की थी उसमें पर्ची सिस्टम श्ुारू किया हुआ था।मैंने इसके लिए जादूई ट्क्सि खोजा।वह कामयाब रहा।प्रति पर्ची दो रूपये की थी।मैं और मेरा साथी सुभाष नायक दोनों गये थे दूकान पर मैंने सौ पर्चियां खरीदी।क्योंकि मुझे बच्चों को पुरस्कार जो देने थे।एक के बाद एक पर्ची खुलती गई और इनाम निकलते गये..............
ईनाम में पांच दीवार घडियां औश्र एक कैमरा निकला साथ ही ग्यारह हाथ घडी।मेरा दोस्त भी काफी हैरान था।उस दिन पूरे गांव में मेरे ही चर्चे थे।पर ये सब तो बच्चों के लिए था।मैंने जब मेरे दोस्त को ट्क्सि बताया तो वह हैरान रह गया।वे बच्चे आज भी नौकरी लगे हैं और उनकी यादें आज भी जेहन में है।और कला तो वैसे भी हर जगह पुरस्कृत होती है।जादूई कला को सम्मान और शिक्षा को सेल्सूट ।
पत्रकार रामकरण प्रजापति यथार्थ
से बात है 23अक्टूबर 2006की मैंने मेरे आस पास के गांवों में अपनी और से ग्रामीण विकास के लिए स्कूल से हटकर स्कूल योजना चला रखी थी।इस योजना के अन्तर्गत मैंने कक्षा आठवीं और दसवीं के राजकीय विद्यालयों के बच्चों को मैं स्कूल समय के बाद पढाता था।इसमें मैंने ग्राम श्योपुराश्1,2केएसआर पालीवाला,28पीबीएन व भगवानसर शामिल किये।मेरा एक महिने का समय था।इस एक महिने में मैं हिन्दी दिवस,गांधी.शास्त्री जयन्ती,बेटी बचाओ अभियान आदि केा खूब तव्वजो दी।बच्चों से चित्रकला,लेख,भाषण,आदि प्रतियोगितायें करवायी।अब समस्या ये थी कि इनके पुरस्कारों की व्यवस्था केसे की जाए।मैंने अपना जादूई दिमाग लगाया।और हमारे गांव में राजेशकुमार वर्मा ने दुकान की थी उसमें पर्ची सिस्टम श्ुारू किया हुआ था।मैंने इसके लिए जादूई ट्क्सि खोजा।वह कामयाब रहा।प्रति पर्ची दो रूपये की थी।मैं और मेरा साथी सुभाष नायक दोनों गये थे दूकान पर मैंने सौ पर्चियां खरीदी।क्योंकि मुझे बच्चों को पुरस्कार जो देने थे।एक के बाद एक पर्ची खुलती गई और इनाम निकलते गये..............
ईनाम में पांच दीवार घडियां औश्र एक कैमरा निकला साथ ही ग्यारह हाथ घडी।मेरा दोस्त भी काफी हैरान था।उस दिन पूरे गांव में मेरे ही चर्चे थे।पर ये सब तो बच्चों के लिए था।मैंने जब मेरे दोस्त को ट्क्सि बताया तो वह हैरान रह गया।वे बच्चे आज भी नौकरी लगे हैं और उनकी यादें आज भी जेहन में है।और कला तो वैसे भी हर जगह पुरस्कृत होती है।जादूई कला को सम्मान और शिक्षा को सेल्सूट ।
Thursday, 17 September 2015
मेरे जीवन की यादगार घटना
पत्रकार रामकरण प्रजापति
उस समय में तीसरी कक्षा से चैथी कक्षा में हुआ था।आज की तरह राजकीय विद्यालयों मेंपुस्तकें नहीं मिला करती थी और हमें तीन किलो हर महिने गेहुं भी मिला करती थी।मेरे पास प्रश्नों के उत्तर याद करने को कुंजी नहीं होती थी।उस समय प्राईमरी स्कूल बीडीओ के अन्तर्गत आते थे।हमारी गुरूजी कुंजियां स्कूल में नहीं लाने देते थे और किताबों से ही निशान लगवाते थे।कक्षा में हर बच्चे के पास कुंजियां थी मैं कुजिया खरिदने की स्थिति में नहीं था।ऐसे मेंने मेरे एक दोस्त की कुंजियां चुरा ली और उसके नाम के उपर एक ग्रेपर लगा दिया और अपना नाम लिख दिया।जब बडी बहन को पता चला तो उन्होंने मेरी पिटाई की और वे कुंजियां उस लडके को दे आयी।अगले महिने जब हमें गेंहु मिली और कुछ बहन के पास रूपये थे।उनसे उन्होंने मुझे कुंजिया दिलाई।बहन मुझसे एक कक्षा आगे थी।उनके पास भी कुजियां नहीं होती थी।तब से मैंने किताब से ही प्रश्नों के उत्तर याद करने शुरू किये यहां तक की पूरी किताब ही मेरे याद होती थी ।उसके बाद तो मैं लगातार 10 वीं कक्षा ते बेझिझक प्रथम ही आया।उस घटना से मैंने बहुत कुछ सीखा।मैं आज भी मेरे इस स्कूल में जाता हूं और असहाय बच्चों केा बुक्स,पेन काॅपी बांटता हूं और टाॅपर को सम्मानित करता हूं।
पत्रकार रामकरण प्रजापति
उस समय में तीसरी कक्षा से चैथी कक्षा में हुआ था।आज की तरह राजकीय विद्यालयों मेंपुस्तकें नहीं मिला करती थी और हमें तीन किलो हर महिने गेहुं भी मिला करती थी।मेरे पास प्रश्नों के उत्तर याद करने को कुंजी नहीं होती थी।उस समय प्राईमरी स्कूल बीडीओ के अन्तर्गत आते थे।हमारी गुरूजी कुंजियां स्कूल में नहीं लाने देते थे और किताबों से ही निशान लगवाते थे।कक्षा में हर बच्चे के पास कुंजियां थी मैं कुजिया खरिदने की स्थिति में नहीं था।ऐसे मेंने मेरे एक दोस्त की कुंजियां चुरा ली और उसके नाम के उपर एक ग्रेपर लगा दिया और अपना नाम लिख दिया।जब बडी बहन को पता चला तो उन्होंने मेरी पिटाई की और वे कुंजियां उस लडके को दे आयी।अगले महिने जब हमें गेंहु मिली और कुछ बहन के पास रूपये थे।उनसे उन्होंने मुझे कुंजिया दिलाई।बहन मुझसे एक कक्षा आगे थी।उनके पास भी कुजियां नहीं होती थी।तब से मैंने किताब से ही प्रश्नों के उत्तर याद करने शुरू किये यहां तक की पूरी किताब ही मेरे याद होती थी ।उसके बाद तो मैं लगातार 10 वीं कक्षा ते बेझिझक प्रथम ही आया।उस घटना से मैंने बहुत कुछ सीखा।मैं आज भी मेरे इस स्कूल में जाता हूं और असहाय बच्चों केा बुक्स,पेन काॅपी बांटता हूं और टाॅपर को सम्मानित करता हूं।
विश्वकर्मा मंदिर पर जागरण व भण्डारा सम्पन्न
visal jagrn
श्योपुराकस्सी17सितम्बर।करनीसर हैड 26पीबीएन पर जागरण व भण्डारा सम्पन्न हुआ।ग्रामीणांे के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में राजू पंजाबी व श्रीराम प्रजापति ने भजन गाये और दुसरे दिन भण्डारा आयोजित हुआ।शंकर टाक ने जानकारी देते हुए बताया जागरण में श्योपुरा,एक ,दो केएसआर,सूरतगढ,छावनी,भगवानसर,पालीवाला प्रेमपुरा,रामपुरा,भागसर सहित अनेक गांवो के लोग जागरण में आये।मेले में युवतियों ने श्रृंगार के सामान की खरीददारी की।
Wednesday, 16 September 2015
बेटी बचाओ बेटी पढाओ बेटी जागरूक करो अभियान शुरू
बेटी बचाओ बेटी पढाओ बेटी जागरूक करो अभियान शुरू
श्योपुराकस्सी,गांव श्योपुरा के राजकीय माध्यमिक विद्यालय में शुक्रवार रात्रि को ग्राम पंचायत चार केएसआर के ग्रामीणों की और से बेटी बचाओ बेटी पढाओ बेटी जागरूक करो अभियान शुरू शुरू किया।ग्रामवासियों ने अध्यापकों ,सामाजिक कार्यकर्ताओं ओर विद्यार्थियों का सम्मान किया।कार्यक्रम मंे राजस्थान प्रशासनिक सेवा में चयनित हुए डाॅ अवि गर्ग ने कहा मैं ग्रामीण माहौल में हो रहे इस तरह के बदलाब से काफी प्रसन्न हूं जो इस प्रकार के कार्यक्रम का आगाज किया।मेरी सोच है आज गाय,बेटी और समाज की रक्षा करना हमारा फर्ज है।मैं इस मंच के माध्यम से यह घोषणा करता हूं गांव की बेटियों को धनाभाव में पढाई से बंचित नहीं रहना पडेगा।एम्बिशन एकेडमी ऐसे असहाय परिवारों की बेटियों को निशुल्क शिक्षा देगी।उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष के दिनो की बातें भी बताई।योगेश सूरतगढ ने बेटियों के इस सामाजिक कार्यक्रम का समर्थन करते हुए कहा मैंने मेरी पढाई के बजाय पहले बहन को कामयाब किया और फिर अपनी पढाई को आगे बढाया।राजस्थानी के हिमायती साहित्यकार मनोज कुमार स्वामी ने कहा बेटियां की संख्या जब घर में ज्यादा हो जाती है तो उनके नाम भी धापली,बसकरो रख दिये जाते हैं ।जहां तक संभव हो बेटियों को ज्यादा से ज्यादा आगे की पढाई करायें।सूरतगढ सदर थाना प्रभारी मनोज शर्मा ने बेटियो को आगे बढने की प्रेरणा देते हुए निडर बनने और किसी भी प्रकार की समस्या हो तो समाधान का आसवासन दिया।भगतसिंह युवा मंडल अध्यक्ष राजकुमार मुंजाल ने बेटियों को पढलिख देश सेवा में आगे आने का आहवान किया।नायक समाज के सूरतगढ ब्लाॅक अध्यक्ष साहबराम लोहरा ने कहा बेटियां भी आज किसी कार्य में कम नहीं है।उन्हें भी सामाजिक कार्यो में बढचढकर भाग लेना चाहिए।कार्यक्रम की मुख्यातिथि सेवानिवृत जिला शिक्षाधिकारी तारावती भादू ने कहा ये कार्यक्रम ऐतिहासिक है मै इसके आयोजक पत्रकार रामकरण प्रजापति की सराहना करती हूं।निन्होंने इस कार्यक्रम को इस रूप में समेटा।कार्यक्रम में उन्होंने अपने जीवन के कठिन समय के बारे में बताते हूए कहा मैंने बुजूर्गों हेतु चैपाल कार्यक्रम चालू कर उन्हंे नाटकों के माध्यम से पढाना शुरू किया।उसके बाद बाल गायक विनोद सागर ने बेटी बचाओ पर संगीत मयी कार्यक्रम दिया और कहा आज हम सब अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं।आज के युवा पीढी भटकाव में आ गयी है।आज भी वे रहणी,बहणी और सहणी नहीं सीखे है।इस कार्यक्रम के मुख्यतिथि माननीय डूंगरराम गेधर ने इसे जनजागरण का कार्यक्रम बताते हुए इसे निरन्तर आगे जारी रखने का आहवान किया और कहा रामकरण प्रजापति ने ग्राम पंचायत को एक नया प्रारूप दिया है मैं सरपंच महोदय से आग्रह करूंगा कि वे इसे सुचारू बनाने में योगदान दे और पंचायत को बेटी बचाओ अभियान से जोडे रखे।इस कार्यक्रम मे ये ये सम्मानित हुए......सूरतगढ के पूर्व प्रधान सुभाष भुक्कर,डाॅ अवि गर्ग,योगेश सूरतगढ,सुभाष कारगवाल,किरण कुमार,पत्रकार मनोज कुमार स्वामी,चेतराम ढुकिया,केवल मायल,एस के दहिया,कमलेश रोलण,विमला राठौड,कविता जलन्धरा,महावीर इन्टरनेशनल सूरतगढ,रामकुमार चाहर,आंगलबाडी की धापादेवी,शिमलादेवी,नेहारानी,साहबराम सहारण,रामकुमार खिलेरी,रामजीलाल फौजी इनको ग्राम पंचायत की अैर से समृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।कार्यक्रम का मंच संचालन रामकरण प्रजापति ने किया।कार्यक्रम में प्रभुदयाल निराणियां,मदनलाल जलन्धरा,जसकरण सिंह,सुलखनसिंह बरार,अमरीक सिंह,पवन मायल आदि ने विशेष योगदान दिया
श्योपुराकस्सी,गांव श्योपुरा के राजकीय माध्यमिक विद्यालय में शुक्रवार रात्रि को ग्राम पंचायत चार केएसआर के ग्रामीणों की और से बेटी बचाओ बेटी पढाओ बेटी जागरूक करो अभियान शुरू शुरू किया।ग्रामवासियों ने अध्यापकों ,सामाजिक कार्यकर्ताओं ओर विद्यार्थियों का सम्मान किया।कार्यक्रम मंे राजस्थान प्रशासनिक सेवा में चयनित हुए डाॅ अवि गर्ग ने कहा मैं ग्रामीण माहौल में हो रहे इस तरह के बदलाब से काफी प्रसन्न हूं जो इस प्रकार के कार्यक्रम का आगाज किया।मेरी सोच है आज गाय,बेटी और समाज की रक्षा करना हमारा फर्ज है।मैं इस मंच के माध्यम से यह घोषणा करता हूं गांव की बेटियों को धनाभाव में पढाई से बंचित नहीं रहना पडेगा।एम्बिशन एकेडमी ऐसे असहाय परिवारों की बेटियों को निशुल्क शिक्षा देगी।उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष के दिनो की बातें भी बताई।योगेश सूरतगढ ने बेटियों के इस सामाजिक कार्यक्रम का समर्थन करते हुए कहा मैंने मेरी पढाई के बजाय पहले बहन को कामयाब किया और फिर अपनी पढाई को आगे बढाया।राजस्थानी के हिमायती साहित्यकार मनोज कुमार स्वामी ने कहा बेटियां की संख्या जब घर में ज्यादा हो जाती है तो उनके नाम भी धापली,बसकरो रख दिये जाते हैं ।जहां तक संभव हो बेटियों को ज्यादा से ज्यादा आगे की पढाई करायें।सूरतगढ सदर थाना प्रभारी मनोज शर्मा ने बेटियो को आगे बढने की प्रेरणा देते हुए निडर बनने और किसी भी प्रकार की समस्या हो तो समाधान का आसवासन दिया।भगतसिंह युवा मंडल अध्यक्ष राजकुमार मुंजाल ने बेटियों को पढलिख देश सेवा में आगे आने का आहवान किया।नायक समाज के सूरतगढ ब्लाॅक अध्यक्ष साहबराम लोहरा ने कहा बेटियां भी आज किसी कार्य में कम नहीं है।उन्हें भी सामाजिक कार्यो में बढचढकर भाग लेना चाहिए।कार्यक्रम की मुख्यातिथि सेवानिवृत जिला शिक्षाधिकारी तारावती भादू ने कहा ये कार्यक्रम ऐतिहासिक है मै इसके आयोजक पत्रकार रामकरण प्रजापति की सराहना करती हूं।निन्होंने इस कार्यक्रम को इस रूप में समेटा।कार्यक्रम में उन्होंने अपने जीवन के कठिन समय के बारे में बताते हूए कहा मैंने बुजूर्गों हेतु चैपाल कार्यक्रम चालू कर उन्हंे नाटकों के माध्यम से पढाना शुरू किया।उसके बाद बाल गायक विनोद सागर ने बेटी बचाओ पर संगीत मयी कार्यक्रम दिया और कहा आज हम सब अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं।आज के युवा पीढी भटकाव में आ गयी है।आज भी वे रहणी,बहणी और सहणी नहीं सीखे है।इस कार्यक्रम के मुख्यतिथि माननीय डूंगरराम गेधर ने इसे जनजागरण का कार्यक्रम बताते हुए इसे निरन्तर आगे जारी रखने का आहवान किया और कहा रामकरण प्रजापति ने ग्राम पंचायत को एक नया प्रारूप दिया है मैं सरपंच महोदय से आग्रह करूंगा कि वे इसे सुचारू बनाने में योगदान दे और पंचायत को बेटी बचाओ अभियान से जोडे रखे।इस कार्यक्रम मे ये ये सम्मानित हुए......सूरतगढ के पूर्व प्रधान सुभाष भुक्कर,डाॅ अवि गर्ग,योगेश सूरतगढ,सुभाष कारगवाल,किरण कुमार,पत्रकार मनोज कुमार स्वामी,चेतराम ढुकिया,केवल मायल,एस के दहिया,कमलेश रोलण,विमला राठौड,कविता जलन्धरा,महावीर इन्टरनेशनल सूरतगढ,रामकुमार चाहर,आंगलबाडी की धापादेवी,शिमलादेवी,नेहारानी,साहबराम सहारण,रामकुमार खिलेरी,रामजीलाल फौजी इनको ग्राम पंचायत की अैर से समृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।कार्यक्रम का मंच संचालन रामकरण प्रजापति ने किया।कार्यक्रम में प्रभुदयाल निराणियां,मदनलाल जलन्धरा,जसकरण सिंह,सुलखनसिंह बरार,अमरीक सिंह,पवन मायल आदि ने विशेष योगदान दिया
कला को समर्पित एक युवा।
भारत देश की लुपत हो चुकी पुरातन सरकंडा दस्तकारी कला को बचना चाहते हैं। अभिषेक कुमार चौहान।
भारत देश की इस अद्भुद कला को वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करवाना चाहते है ये युवा।
नहीं मिली सरकार से अब तक कोई मदद। लगभग तीन महीनो से अपने प्रयासों के कारण मीडिया में आ रहे हैं अभिषेक।
देश के साथ विदेशो में भी कला की प्रदर्शनियां लगा बढ़ाना चाहते है अपने देश का गौरव।
मौन है सरकार।
एक समय ऐसा था जब यह कला अपने चरम पर थी। इस कला की कलाकृतियों की भारत के लोगो में डिमांड थी। लेकिन वर्तमान समय में ये कला अलोप हो रही हैं। इस कला की जगह चाइनीज सजावटी समान ले रहा है। सरकार भी भारत की इस विरासती कला को कोई सहयोग नही दे रही।जिस कारण अब बहुत कम लोग इस कला के बारे में जानते हैं। उनमे से एक बसत विहार , राजपुरा शहर (पटिआला , पंजाब ) के वासी अभिषेक कुमार चौहान हैं। अभिषेक जी ने हॉल ही में अपनी बी ऐ की परीक्षा पास की है। और उन्होंने सरकंडा दस्तकारी से अद्भुद कलाकृतियां बनाई है। उन्होंने इस कला को जीवित रखने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने अपने कला के माध्यम से विभिन्न तरह की कलाकृतियां बनाकर लोगो को अचंभित कर दिया है। बीते दिनों पटेल कालेज व् सरकारी स्कूल में उत्क कला की प्रदर्शनी लगई गयी। जिसे उच्चाधिकारियों व् समाज के लोगो ने खूब सराहा। अभिषेक ने सरकंडे से बनाये मोर , झूला ,शेषनाग , घोंसला , फूल , गुलदस्ता ,झुनझुना ,डफली , भगवान श्री कृष्ण जी की आकृति ने लोगो को कायल कर दिया।
दादा जी से सीखी कला।
अभिषेक कुमार चौहान जी कहना है कि उसने यह कला अपने दादा जी श्री राम चाँद जी से सीखी है। और उन्होंने यह कला अपने चाचा जी से सीखी थी। यह कला हमें उस समय की याद दिलवाती हैं। जब हमारे पूर्वजो के पास घरों को सजानें के लिए प्लास्टिक अथवा धातु का समान नही होता था। दादा जी का सपना है की इन कलाकृतियों की देश और विदेशों में प्रदर्शनियां लगाई जाएँ। ताकि पूरा विश्वाश इस कला का दीदार कर सके और लोग इस कला को खरीदे टंकी एक और इस अमुल्ये कला को लुपत होने से बचाया जा सके। साथ ही विदेशों मुंद्रा अर्जित की सके। इस कला से अपने भारत देश का स्वाभिमान और इस वतन की माटी की खुशबू आती है।
कैसे बनती है कलाकृति।
अभिषेक ने बताया की यह कला सरकंडे से बनती है। जो की दलदल उगते है जिन्हे दलदल में घुस कर एक एक करके सरकंडे इकठे किये जाते है। और उनको कड़ी मेहनत के बाद बुन कर कलाकृति तयार की जाती है। जिन्हे बनाने कई कई दिन लग जाते है। अगर बुनती करते समय कोई सरकंडा टूट जाये तो वह कलाकृति जाती है जिसे दुबारा बनाना पड़ता है।
सरकार से मदद की उम्मीद।
दस्तकारी परिवार से होने क बावजूत अभिषेक अपनी शिक्षा ले साथ ही साथ दादा जी के मार्गदर्शन कलाकृतियां बनाने का गुण भी हासिल कर रहे हैं। क्यूंकि ये उनका पुश्तैनी वयवसाय है। लेकिन वह इस पेशे को आगे नही ले जा पा रहे। कलाकृतियां बनाने जहां कड़ी मेहनत की आवश्यकता पड़ती है और पर्दर्शनी आदि लगाने में धन की भी आवश्यकता पड़ती है। अभिषेक सरकार से उम्मीद करते है की सरकार उन्हें कला विभाग में सरकारी नौकरी दे था उनकी कला की प्रदर्शनियां सरकारी खर्चे पर लगये। ये कला अपने भारत देश का गौरव है। सरकार को इस कला को इतहास बनने से बचना चाहिए।
abhishek kumar chouhan
9988373679
मेरियां निशानियां एल्बम की वीडियो शुटिंग समाप्त
सूरतगढ,सूरतगढ के न्यू श्री सांई फिल्म प्रोडक्शन के बैनर तले बन रहे पंजाबी एल्बम के गाने मेरियां निशानियां सांब के रखी की विडियो शुटिंग शुक्रवार को सूरतगढ के राजकीय महाविद्यालय,मानकसर टिल्ले पर किशनपुरा व श्योपुरा गांव में हुई।प्रोडक्शन के डायरेक्टर आनन्द यादव ने बताया एल्बम के गाने मंे चंडीगढ के एलएल बिटस ने संगीत दिया है।सूरतगढ के ही सुरेश कुमार सूर्य ने गाया है।स्थानिय माॅडल कलाकारों प्रमीला चैहान,विनोद व हिमांशु शर्मा ने रोल किया है।चंडीगढ की पारूल ठाकुर ने हीरोईन की भूमिका निभाई है।सह डायरेक्टर पवन भार्गव ने बताया गाने को धीरज राजपूत व धीरज शर्मा ने मुम्बई के डायरेक्शन में शूट हुआ है।प्रैस प्रवक्ता रामकरण पत्रकार ने जानकारी दी प्राॅडक्शन द्वारा स्थानिय कलाकारों गायकों को एक्टिग का मौका दिया जा रहा है।प्राॅडक्शन द्वारा जल्द ही एक डाॅक्यूमैन्टरी व हिन्दी फिल्म शूट की जाएगी।
सूरतगढ,सूरतगढ के न्यू श्री सांई फिल्म प्रोडक्शन के बैनर तले बन रहे पंजाबी एल्बम के गाने मेरियां निशानियां सांब के रखी की विडियो शुटिंग शुक्रवार को सूरतगढ के राजकीय महाविद्यालय,मानकसर टिल्ले पर किशनपुरा व श्योपुरा गांव में हुई।प्रोडक्शन के डायरेक्टर आनन्द यादव ने बताया एल्बम के गाने मंे चंडीगढ के एलएल बिटस ने संगीत दिया है।सूरतगढ के ही सुरेश कुमार सूर्य ने गाया है।स्थानिय माॅडल कलाकारों प्रमीला चैहान,विनोद व हिमांशु शर्मा ने रोल किया है।चंडीगढ की पारूल ठाकुर ने हीरोईन की भूमिका निभाई है।सह डायरेक्टर पवन भार्गव ने बताया गाने को धीरज राजपूत व धीरज शर्मा ने मुम्बई के डायरेक्शन में शूट हुआ है।प्रैस प्रवक्ता रामकरण पत्रकार ने जानकारी दी प्राॅडक्शन द्वारा स्थानिय कलाकारों गायकों को एक्टिग का मौका दिया जा रहा है।प्राॅडक्शन द्वारा जल्द ही एक डाॅक्यूमैन्टरी व हिन्दी फिल्म शूट की जाएगी।
किसान हित के लिए अब अक्षय भी आगे आये.........
श्योपुराकस्सी।अब किसानों की आशाओं की किरण बनकर अभिनेता अक्षय कुमार आगे आये हैं ऐसे में समाज के वो धनवान वर्ग कहां है जो किसानों के नाम की राजनिति करते हैं।इससे पहले अभिनेता नाना पाटेकर भी किसान हित में आगे आ चुके हैं। क्या क्रिकेट की टीम खरीदने वाले शाहरूख और अमिताभ बच्चन के दिलों में भी भारत के किसानों के लिए प्यार है।अगर है तो वे भी जरूर आगे आये।
श्योपुराकस्सी।अब किसानों की आशाओं की किरण बनकर अभिनेता अक्षय कुमार आगे आये हैं ऐसे में समाज के वो धनवान वर्ग कहां है जो किसानों के नाम की राजनिति करते हैं।इससे पहले अभिनेता नाना पाटेकर भी किसान हित में आगे आ चुके हैं। क्या क्रिकेट की टीम खरीदने वाले शाहरूख और अमिताभ बच्चन के दिलों में भी भारत के किसानों के लिए प्यार है।अगर है तो वे भी जरूर आगे आये।
जिला उपभोक्ता मंच के फैसले पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक
श्योपुराकस्सी16सितम्बर,जयपुर हाईकोर्ट ने जिला उपभोक्ता मंच के एक फैसले पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी है।प्राप्त जानकारी के अनुसार श्योुपुराकस्सी छावनी स्थित एसके फोटो स्टूडियो मार्फत मैसर्स दहिया इंटरप्राइजेज डीटीडीसी कोरियर कार्गो से एक सैनिक ने बंगाल के लिए सामान बुक करवाया था जो बीच रस्ते में ही कहीं खो गया और गंतव्य तक नहीं पहुंचा।सैनिक ने जिला उपभोक्ता मंच श्रीगंगानगर में वाद दायर किया।जिला उपभोक्ता मंच ने 22 जून 2015 को डीटीडीसी संचालक दहिया इन्टर प्राइजेज के संचालक ने जयपुर राज्य वाद दायर किया।जयपुर में वरिष्ठ अधिवक्ता नीतीश बागडी ने फैसले को चुनौती देते हुए स्टे देने की मांग की।अन्त में राज्य आयोग मंच ने जिला उपभोक्ता मंच श्रीगंगानगर के फैसले पर 9 सित्म्बर को आगामी आदेश तक स्टे दे दिया।पीठासीन सदस्य विनय कुमार चावला व सुनीता रांका ने अग्रिम आदेश ते फैसले को स्थगित करने का आदेश दिया।
श्योपुराकस्सी16सितम्बर,जयपुर हाईकोर्ट ने जिला उपभोक्ता मंच के एक फैसले पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी है।प्राप्त जानकारी के अनुसार श्योुपुराकस्सी छावनी स्थित एसके फोटो स्टूडियो मार्फत मैसर्स दहिया इंटरप्राइजेज डीटीडीसी कोरियर कार्गो से एक सैनिक ने बंगाल के लिए सामान बुक करवाया था जो बीच रस्ते में ही कहीं खो गया और गंतव्य तक नहीं पहुंचा।सैनिक ने जिला उपभोक्ता मंच श्रीगंगानगर में वाद दायर किया।जिला उपभोक्ता मंच ने 22 जून 2015 को डीटीडीसी संचालक दहिया इन्टर प्राइजेज के संचालक ने जयपुर राज्य वाद दायर किया।जयपुर में वरिष्ठ अधिवक्ता नीतीश बागडी ने फैसले को चुनौती देते हुए स्टे देने की मांग की।अन्त में राज्य आयोग मंच ने जिला उपभोक्ता मंच श्रीगंगानगर के फैसले पर 9 सित्म्बर को आगामी आदेश तक स्टे दे दिया।पीठासीन सदस्य विनय कुमार चावला व सुनीता रांका ने अग्रिम आदेश ते फैसले को स्थगित करने का आदेश दिया।
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