Friday, 25 September 2015

कहानी -सुकन्या
बेटा देखना बाहर कौन है कोई दरवाजा खटखटा रहा है। मैंने कहा।
अभी तान्या आॅफिस से अन्दर आकर घुसी ही थी,मैंने उसे नई जिम्मेदारी सौंप दी।
 अभी आई बाबूजी।तान्या रसोईघर से बोली।
मैं फिर से कहानियां लिखने में व्यस्त हो गया।कहानी के प्रत्येक कथ्य में खोया था कि बेटी तान्या ने आवाज दी।
            बाबूजी सुकन्या दीदी है।
कौन सुकन्या दीदी?मैंने प्रश्नसूचक नजरों से पूछा।
बाबूजी वही सुकन्या दीदी हमारी दूसरी...........
ओह मेरी दुसरी बेटी।मैंने फिर से विष्मयाधिवोध से कहा।
बाबूजी वो कह रही हैवो अन्दर नहीं आ सकती है।बेटा अन्दर क्यों नहीं आ सकती हम कोई पराये थोडे ही हैं।बेटी ही तो है हमारी।तुम उसे जबरदस्ती अन्दर ले आओ और चाय की प्याली और नाश्ता लाओ।मैंने कहानी से नजरें चुराते हुए कहा।
मैं बाहर तक खडा होकर जाने की स्थिति में नहीं था।एक तो शरीर वयोवृद्ध हो गया था और नजरें भी कमजोर हो गई,ना जाने कब किससे टकरा जाउं।
              नमस्ते बाबूजी।
     नमस्ते बेटी।मैं भी उत्तरोतर बोला।
इसी बीच तान्या मेरे लिए और सुकन्या के लिए चाय नाश्ता ले आयी।तान्या का आॅफिस जाने का वक्त हो गया।सो चली गई।
अच्छा तो सुकन्या अब बताओ इतने दिनांे तक कहां थी।क्या हमारे घर की यांदे तुम यहीं छोडकर चली गई?मैंने हंसते हुए और अपना पक्ष मजबूत करते हुए कहा।
            जी बाबूजी,यही सत्य मानांे।
मगर सुकन्या के इस उत्तर में एक खामोशी छाई हुई थी,उदासी का भाव साफ नजर आ रहा था।
    इससे पहले सुकन्या मुझे बीस वर्ष पहले मिली थी।इतने दिनांे बाद पाकर मैं उतना खुश नहीं हुआ जितना कि आज से दस बारह वर्ष पहले होता।मेरे चेहरे पर उदासियों के भाव ज्यांे के त्यों बने थे।
जाओ सुकन्या एक गिलास रसोई घर से पानी ले आओ।मैं बैठे-बैठे प्यास की स्थिति में आ गया था।मैंने लेखनी को चश्मा पर लगा लिया और कुछ सोचने लगा।काफी देर हो गई थी सुकन्या अब तक आयी क्यों नहीं?मैं अपने ही विचारों में खोया था।
              मगर सामने बेठी सुकन्या भी खेदमयी स्थिति में सिर झुकाये मेर बोलने का इन्तजार कर रही थी।मैं ख्यालों से जागा पर सामने पानी नहीं था।सुकन्या सिर झुकाये बेठी थी ऐसा लग रहा था।वैसे भी सुकन्या के लिए हमारा घर अनजान थोडे ही था कि उसे कुछ पता न हो।
                ये वही सुकन्या थी जो कभी मेरे   इशारे से पहले ही काम कर दिया करती थी। अभिमान का कोई नाम नहीं था।कितनी विनम्र थी।आज ये अभिमान ...।मैं मन ही मन ना जाने क्या क्या सोचे जा रहा था।नहीं सुकन्या नहीं बदल सकती।सुकन्या कैसे बदल सकती है?मन में विचार करते करते कहानी के कथ्यांे पर कडी नजर डाले हुए था।मेरी नजरें पुस्तक तक सिमित हो गई थी।मैं सुकन्या की केवल धुंधली तस्वीर से और मिठी आवाज के सहारे पहचानने में लगा था।
             पानी ना मिलने के कारण मेरी प्यास तडप में बदल गई थी और मैं कब औंधे मूंह नीचे गिर गया कुध पता नहीं चला।मेरी सांसे तेजी से चल रही थी,मुंह पर मास्क लगा थाऔर  मुझे आॅक्सीजन लगी हुई थी।मेरे पास कौन था मैं पहचानने की कोशिश कर रहा था।बहुत कुछ करने पर भी नजरें उस तक नहीं पहुंच पायीं।मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं घर के किस कोने में हूं।मैंने तडप जारी रखी।किसी ने मेरे पास आने का साहस किया लेकिन उस जबरदस्ती रोक दिया गया।मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कौनसी कहानी का कौनसा पात्र हूं।
               मैंने चीख कर आवाज लगाई तान्या बेटा पानी...........
 बाबूजी यहां तान्या नहीं है,मैं हूं आपकी बेटी सुकन्या।
कौन सुकन्या ,मैं तो किसी सुकन्या को नहीं जानता हूं तान्या के अलावा।मैंने झुंझलाते हुए कहा।अब मुझे केवल मंद मंद सा संवाद सुनाई दे रहा था।
      डाॅक्टर साहब इन्हें बचा लिजिये,शायद इन्होंने याददास्त खो दी है।किसी लडकी की दयामयी आवाज मेरे कानों में पडी।
   ये लो मैंने जरूरी दवाईयां लिख दी है।पास ही के हाॅस्पीटल से ले आओ।डाॅक्टर लडकी को समझाते हुए बोल रहे थे।कमरे में अब केवल डाॅक्टर ही थे ,मुझे नींद आ गई।मैं उठा तेा ग्लूकोज और खून चढाया जा रहा था।मुंह पर मास्क लगा था।
   अब मुझे सांस लेने में कोई दिक्कत नही हो रही थी।नजरें भी दूर तक जा रही थी। मैं शहर के किसी हाॅस्पीटल में था,कमरे में डाॅक्टर मेरे ईलाज में व्यस्त थे और बाहर से किसी के सुबकने की आवाज आ रही थी।
               मैंने देखा वह लडकी कांच के जडे दरवाजे से बाहर बैठी रो रही थी।
  डाॅक्टर वो लडकी कौन है?मैंने इशारे से पूछाा।
जी,अपने आप को सुकन्या नाम लेकर आप ही की बेटी बता रही है।
क्या आपके एक ही विकलांग लडकी है लडका नहीं है।डाॅक्टर ने मुझसे संशय की नजरों से देखते हुए पूछा।
         मैं डाॅक्टर की बातों को समझ नहीं सका।
अब मैं चलने में भी समर्थ हो गया था और दिखाई भी साफ देने लगा था।
         सुकन्या तुम और विकलांग!सहसा मैंने सुकन्या के कंधे पर हाथ रखते हुए प्रश्नात्मक दृष्टि से कहा जैसे मुझे पहले मालूम ही ना हो।
      बाबूजी आप यहां,आप आराम करो अभी।उसने अबोधपूर्वक कहा।
हाॅं बेटी अब मैं पूर्णतया ठीक हूं।अब मुझे दिखाई भी दे रहा है।मैने खुशी का अहसास कराते हुए कहा।पर तुम!विकलांग कैसे हो  गई और चल भी नहीं सकती।मैंने उसके अबोध मन पर यकायक प्रश्नों की पिटारी खोल दी।
मैं एक तरफ खडा अपने आप को अपराधबोध समझने लगा।काश!मुझे पता होता सुकन्या विकलांग है तो मै। पानी स्वयं लाकर पी लेता,चाहे किसी से टकराता लेकिन अबोध को टिस तो नहीं पहुंचती।
     घर चलते हैं बाबूजी तान्या हमारा इन्तजार कर रही होगी।दोनोे ने आॅटो किराये पर कर लिया।रास्ते में दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई।
   घर आये तो तान्या हमारा ही इन्तजार कर रही थी।शायद आज आॅफिस से जल्दी आ गई थी।घर पहुंचते ही तान्या ने उन्हें डांटना शुरू कर दिया।कहां गये थे बाबूजी,आपको कितनी बार समझाया है,कोई काम हो तो मुझे बता दिया करो,मैं कर दिया करूंगी।
          क्यों डांट रही हो बहन इसमें बाबूजी की गलती थोडे ही है ये तो उम्र का पडाव है,जरा सा शरीर में दर्द हुआ था सो अस्पताल ले गई।
        मुझे फोन कर देती क्यों इतना कष्ठ उठाया बहन।
 कैसे करती ,ये सब अचानक हो गया और फिर मेरे पास आपके नम्बर भी तो नहीं थे।बडी मुश्किल द्वारा आटो किया और हाॅस्पिटल ले   गई ।फोन करने का वक्त ही कहां था,ये तो बेहोश हो गये थे।
           तान्या ,सुकन्या को रसोईघर में ले गई।मैं सुकन्या के बारे में सोचता रहा।
               रवि और सुकन्या बहुत चाहते थे एक दूसरे को ।मैंने सुकन्या को पहली बार काॅलेज में पढाते वक्त देखा था।बडे ही चुलबुलेपन से अपनी सखियों से कह रही थी -‘जानते हो मेरे गुरूजी कहानीकार हैं,बहुत बडी बडी कहानियां लिखते हैं,बाप रे।’जैसे कोई टीवी सिरियल ही बना देते हों।
          रवि मुर्गा बन जाओ।कक्षा में जरा भी पढने में ध्यान नहीं देते सारा दिन बस बातें ही बातें ।
तभी मुझे किसी अध्यापक ने जरूरी काम से बाहर बुला लिया।करीब घंटे भर बाद लौटा तो देखा सारे बच्चे रवि के आस पास बैठे घुसर-पुसर कर रहे थे।मैंने सभी को अपनी -अपनी बेंचों पर बैठने को कहा।सुकन्या अब भी रवि के पास बैठी आंसू बहा रही थी।
               उठो बेटी रवि तो नादान है तुम तो समझदार हो।कक्षा में बातें मत किया करो।यह तुम्हारे जीवन का पहला पडाव है।अभी तुम्हें बहुत आगे जाना है,अपने मम्मी-पापा का नाम रोशन करना है।समय तुम्हारे लिये बहुत महत्ता रखता है।अभी से इसका सदुपयोग करो।
          तभी घंटी बजी और सभी मंच के पास जा बैठे आज वार्षिक काव्य सम्मेलन होना था।मैंने भी इस प्रतियोगिता में निर्णायक भूमिका अदा करनी थी।मैं सुकन्या को प्रथम पुरस्कार के लिए कैसे नामांकित कर सकता था।हालांकि उसी के काव्य पर तालियां की गडगडाहठ आयी थी।मैं जानना चाहता था सुकन्या का मन कैसा है?
             सचमुच कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।ना ही कोई शंका और ना ही कोई गलानी।सहेलियों से बस इतना ही कहते हुए मैंने सुना  मेरा प्रयास अच्छा नहीं था। आज रवि होता  तो प्रथम मैं ही आती।और मैं संकुचाते हुए उनकी टोली के पास से गुजर गया।काॅलेज से सीधा हाॅस्पिटल गया जहां रवि भर्ती करवाया हुआ था।डाॅक्टर ने बताया रवि की टांगे काफी कमजोर हो गई हैं।अब वह की भी उठकर चल नहीं सकेगा।इसी कारण से रवि की काॅलेज से भी छुटटी हेा गई।
          रवि के कारण मेरा भी काॅलेज छूट गया।रवि को बडे बडे हाॅस्पीटलांे में ले जाया गया।मगर रवि बच नहीं पाया।अब हम केवल दो ही जने बचे थे ,तान्या अभी बच्ची ही थी।पास की के स्कूल में भर्ती करवा दिया।और अपने दैनिक जीवन में लग गया कहानी लिखने को।हर बार मन में एक ही कसक रहती इस कहानी का पात्र कौन है।बडे बडे पुरस्कार मिले पर संतोष नहीं।
        इसी बीच सुकन्या के पत्र भी आते थे ।बाबूजी रवि कैसा है?क्या वह पूर्णतया ठीक हो गया?हर बार उसके ढेरांे सवाल होते।मगर मै। उत्तर क्या देता ,यही कि तुम्हारे प्यार का दुश्मन मैं ही हूं।मेरा भी तो शिष्य के प्रति फर्ज बनता था,वही तो मैंने किया।
         मैं जिस काॅलेज में प्राध्यापक था उसी काॅलेज में सुकन्या प्राध्यापिका बन गयी।तान्या को भी उसी काॅलेज से गुजरना था।लेकिन अब उसे गुरू शिष्य का नहीं मित्रता का रिस्ता मिला।
       मैं हर रोज कहता तान्या तुम सुकन्या को कब से जानती हो।और वह कहती जन्म से बाबूजी।
        मैं जानता था सुकन्या से उसकी विकलांगता के बारे में कोई उत्तर नहीं मिलेगा।उसकी नजर घर में रवि को देखने में लगी थी।
  जल्द ही खुशी का माहौल बन गया।जैसे आज फिर मंच पर आने वाली हो।
 धीरे से तान्या ने मेरे हाथ में एक पुस्तक थमा दी लिखा था-दी ग्रेट स्टाॅरी  राईटर  माई फादर. लेखिका सुकन्या।उसमें वो ही कहानियां थी जो कभी मैंने लिखी  थी जब पढी तो पता चला।लेकिन ये काफी सुन्दर ढंग से प्रकाशित हुई थी अब।
             उउउउउउउउउ.... ये लो अब अपना पुरस्कार।
तान्या अनमना ढंग बनाते हुए बोली।
       मैं खुशी से चीखा।ये तो नोबेल पुरस्कार है।बेटी तुम्हें मिला है।मन ही मन खुशी के भाव थे।
         जी नहीं बाबूजी,आपको।सुकन्या बीच में ही बोल उठी।रवि होता तो ये पुरस्कार मेरा ही था।अब तो ये आपका ही है।
         मेैंने पुस्तक को ध्यान से पढा अन्तिम पक्तिंयों में लिखा था आने वाले समय में दहेज मिलेगा लेकिन दुल्हे को नहीं ,दुल्हन को और वो भी दुल्हे के रूप में।
           एक तरफ मेरे पास कहानियों के सैंकडों ग्रंथ पडे थे तो एक तरफ ये पुस्तक।मैं इस पुस्तक में दम महसूस कर रहा था।मैंने बडे ही प्यार से सुकन्या का माथा चूम लिया।
          ठीक है बाबूजी अब मैं अपने घर जाती हूं।लडकी का घर उसके पत्तिदेव का घर ही होता है।तान्या ने रोकना चाहा पर वह रूकी नहीं।और मेरे मन में एक प्रश्न छोड गई नारी की इस विकलांगता का कारण क्या है।क्या पुरूष वर्ग की दबंगता या नारी का ममत्व।मैं सुकन्या को जाते हुए देखता ही रहा।इन्तजार करता रहा उसके लौटकर आने का।मगर वो कभी नहीं आयी।
              काश!मैं रवि और सुकन्या की मित्रता समझ पाता कि नारी को भी हक है अपने अधिकारों में स्वायत्तता रखने का।मगर समझता भी कैसे मैं तो पुरूष हूं ना ।एक बार फिर मेरी नजर मैंने पुरस्कार और पुस्तक पर डाली वो सुकन्या के प्यार से कहीं छोटे नजर आये।
          तान्या की आवाज आयी,बाबूजी सो जाओ सुबह मुझे मेरे लिये लडका देखने जाना है।
        सहसा मैं कुर्सी से उठा और बेटी के सपनों के राजकुमार से मिलने के खातिर बिस्तर पर सोने को चल दिया।सामने रवि का फोटो था तो मन में सुकन्या का साहस।
   .......पत्रकार रामकरण प्रजापति यथार्थ

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