Thursday, 17 September 2015

मेरे जीवन की यादगार घटना
पत्रकार रामकरण प्रजापति
उस समय में तीसरी कक्षा से चैथी कक्षा में हुआ था।आज की तरह राजकीय विद्यालयों मेंपुस्तकें नहीं मिला करती थी और हमें तीन किलो हर महिने गेहुं भी मिला करती थी।मेरे पास प्रश्नों के उत्तर याद करने को कुंजी नहीं होती थी।उस समय प्राईमरी स्कूल बीडीओ के अन्तर्गत आते थे।हमारी गुरूजी कुंजियां स्कूल में नहीं लाने देते थे और किताबों से ही निशान लगवाते थे।कक्षा में हर बच्चे के पास कुंजियां थी मैं कुजिया खरिदने की स्थिति में नहीं था।ऐसे मेंने मेरे एक दोस्त की कुंजियां चुरा ली और उसके नाम के उपर एक ग्रेपर लगा दिया और अपना नाम लिख दिया।जब बडी बहन को पता चला तो उन्होंने मेरी पिटाई की और वे कुंजियां उस लडके को दे आयी।अगले महिने जब हमें गेंहु मिली और कुछ बहन के पास रूपये थे।उनसे उन्होंने मुझे कुंजिया दिलाई।बहन मुझसे एक कक्षा आगे थी।उनके पास भी कुजियां नहीं होती थी।तब से मैंने किताब से ही प्रश्नों के उत्तर याद करने शुरू किये यहां तक की पूरी किताब ही मेरे याद होती थी ।उसके बाद तो मैं लगातार 10 वीं कक्षा ते बेझिझक प्रथम ही आया।उस घटना से मैंने बहुत कुछ सीखा।मैं आज भी मेरे इस स्कूल में जाता हूं और असहाय बच्चों केा बुक्स,पेन काॅपी बांटता हूं और टाॅपर को सम्मानित करता हूं।

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