मेरे जीवन की यादें.....
पत्रकार रामकरण प्रजापति यथार्थ
से बात है 23अक्टूबर 2006की मैंने मेरे आस पास के गांवों में अपनी और से ग्रामीण विकास के लिए स्कूल से हटकर स्कूल योजना चला रखी थी।इस योजना के अन्तर्गत मैंने कक्षा आठवीं और दसवीं के राजकीय विद्यालयों के बच्चों को मैं स्कूल समय के बाद पढाता था।इसमें मैंने ग्राम श्योपुराश्1,2केएसआर पालीवाला,28पीबीएन व भगवानसर शामिल किये।मेरा एक महिने का समय था।इस एक महिने में मैं हिन्दी दिवस,गांधी.शास्त्री जयन्ती,बेटी बचाओ अभियान आदि केा खूब तव्वजो दी।बच्चों से चित्रकला,लेख,भाषण,आदि प्रतियोगितायें करवायी।अब समस्या ये थी कि इनके पुरस्कारों की व्यवस्था केसे की जाए।मैंने अपना जादूई दिमाग लगाया।और हमारे गांव में राजेशकुमार वर्मा ने दुकान की थी उसमें पर्ची सिस्टम श्ुारू किया हुआ था।मैंने इसके लिए जादूई ट्क्सि खोजा।वह कामयाब रहा।प्रति पर्ची दो रूपये की थी।मैं और मेरा साथी सुभाष नायक दोनों गये थे दूकान पर मैंने सौ पर्चियां खरीदी।क्योंकि मुझे बच्चों को पुरस्कार जो देने थे।एक के बाद एक पर्ची खुलती गई और इनाम निकलते गये..............
ईनाम में पांच दीवार घडियां औश्र एक कैमरा निकला साथ ही ग्यारह हाथ घडी।मेरा दोस्त भी काफी हैरान था।उस दिन पूरे गांव में मेरे ही चर्चे थे।पर ये सब तो बच्चों के लिए था।मैंने जब मेरे दोस्त को ट्क्सि बताया तो वह हैरान रह गया।वे बच्चे आज भी नौकरी लगे हैं और उनकी यादें आज भी जेहन में है।और कला तो वैसे भी हर जगह पुरस्कृत होती है।जादूई कला को सम्मान और शिक्षा को सेल्सूट ।
पत्रकार रामकरण प्रजापति यथार्थ
से बात है 23अक्टूबर 2006की मैंने मेरे आस पास के गांवों में अपनी और से ग्रामीण विकास के लिए स्कूल से हटकर स्कूल योजना चला रखी थी।इस योजना के अन्तर्गत मैंने कक्षा आठवीं और दसवीं के राजकीय विद्यालयों के बच्चों को मैं स्कूल समय के बाद पढाता था।इसमें मैंने ग्राम श्योपुराश्1,2केएसआर पालीवाला,28पीबीएन व भगवानसर शामिल किये।मेरा एक महिने का समय था।इस एक महिने में मैं हिन्दी दिवस,गांधी.शास्त्री जयन्ती,बेटी बचाओ अभियान आदि केा खूब तव्वजो दी।बच्चों से चित्रकला,लेख,भाषण,आदि प्रतियोगितायें करवायी।अब समस्या ये थी कि इनके पुरस्कारों की व्यवस्था केसे की जाए।मैंने अपना जादूई दिमाग लगाया।और हमारे गांव में राजेशकुमार वर्मा ने दुकान की थी उसमें पर्ची सिस्टम श्ुारू किया हुआ था।मैंने इसके लिए जादूई ट्क्सि खोजा।वह कामयाब रहा।प्रति पर्ची दो रूपये की थी।मैं और मेरा साथी सुभाष नायक दोनों गये थे दूकान पर मैंने सौ पर्चियां खरीदी।क्योंकि मुझे बच्चों को पुरस्कार जो देने थे।एक के बाद एक पर्ची खुलती गई और इनाम निकलते गये..............
ईनाम में पांच दीवार घडियां औश्र एक कैमरा निकला साथ ही ग्यारह हाथ घडी।मेरा दोस्त भी काफी हैरान था।उस दिन पूरे गांव में मेरे ही चर्चे थे।पर ये सब तो बच्चों के लिए था।मैंने जब मेरे दोस्त को ट्क्सि बताया तो वह हैरान रह गया।वे बच्चे आज भी नौकरी लगे हैं और उनकी यादें आज भी जेहन में है।और कला तो वैसे भी हर जगह पुरस्कृत होती है।जादूई कला को सम्मान और शिक्षा को सेल्सूट ।
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