गजल
तुम्हारे चरणों की धूल तो मिले।
विरान बगिया में फूल तो खिले।।
यथार्थ अरमान बुनों दिल में।
अंधियारों में एक दीप तो जले।।
कहां अभिमान था तन पर।
देह उठी एक लौ तो जले।।
चले गये जिन्हें जल्दी थी यारो।
आलम ये वक्त का फिर से तो मिले।।
कौन लिखता है तकदीर की रेखाएं।
जिनके हाथ नहीं उनके बच्चे भी तो पलें।।
अश्क भी सूख जाते हैं हमसाया बनकर।
तुम्हारे चरणों की धूल तो मिले।
विरान बगिया में फूल तो खिले।।
यथार्थ अरमान बुनों दिल में।
अंधियारों में एक दीप तो जले।।
कहां अभिमान था तन पर।
देह उठी एक लौ तो जले।।
चले गये जिन्हें जल्दी थी यारो।
आलम ये वक्त का फिर से तो मिले।।
कौन लिखता है तकदीर की रेखाएं।
जिनके हाथ नहीं उनके बच्चे भी तो पलें।।
अश्क भी सूख जाते हैं हमसाया बनकर।
मगर हर किसी की आंखेंा में प्रीत तो चले।।
वो जिन्दा है यारो दिलों में हर किसी के।
जिनके कदम एक वतन की लीक तो चले।।
........पत्रकार/साहित्कार रामकरण प्रजापति यथार्थ.21.08.2007

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